माना जाता है कि हवाई अड्डे के पास स्थित ये मस्जिद क़रीब 300 साल पुरानी है. हम जुमे के दिन यहां पहुंचे थे. मस्जिद पर हमले के बाद ये पहली जुमे की नमाज़ थी.
13 मई की रात कई सौ लोगों की भीड़ ने इस मस्जिद पर हमला बोल दिया था. टूटा गेट, टूटी पत्थर की बेंच, टूटे हुए खिड़की के शीशे, चारों ओर बिखरे शीशे के टुकड़े.
स्थानीय काउंसिल से आए लोग मस्जिद को हुए नुक़सान का जायज़ा ले रहे थे.
मस्जिद के सीसीटीवी फ़ुटेज पर रात का वाक़या क़ैद था. टीवी के दाहिने ऊपरी हिस्से पर शाम सात बजे का वक़्त दिख रहा था.
थोड़ी ही देर में मस्जिद के सामने दंगाइयों का हुजूम इकट्ठा होना शुरू हो जाता है. चेहरे हेल्मेट से ढके थे. उनके हाथों में लाठियों और पत्थर थे.
कुछ लोग मस्जिद के गेट को तोड़ते हुए अंदर घुस गए और मस्जिद के शीशे तोड़ने शुरू कर दिए.
सुरक्षा बलों के आने से हमले थोड़े थमे, लेकिन पत्थरों की बरसात फिर शुरू हो गई.
मस्जिद के ईमाम मोहम्मद नजीब उस शाम घर पर थे जब उन्हें इस हमले के बारे में पता चला.
वो तुरंत मस्जिद जाना चाहते थे लेकिन सुरक्षा कारणों से नहीं गए. वो अगले दिन सुबह मस्जिद पहुंचे.
मोहम्मद नजीब कहते हैं, "मेरा दिल भर आया. मेरा दिल टूट गया. ये अल्लाह का घर है. मैं समझ नहीं पाया कि इसे क्यों तोड़ा गया."
मोहम्मद नजीब बताते हैं कि ईस्टर हमलों के बाद से उन्हें लोगों के व्यवहार में फ़र्क़ दिखने लगा था.
वो बताते हैं, "लोगों के चेहरों को देखकर लगता था कि कुछ बदल गया है. जो लोग हमारे दुकानों पर आते थे उन्होंने आना बंद कर दिया. जो लोग हमसे नज़दीक थे उनके चेहरे पर भी थोड़ी घृणा दिखने लगी."
सोशल मीडिया पर उन दुकानों, व्यापारों का नाम शेयर किया गया जिनके मालिक मुसलमान थे. लोगों से कहा गया कि वो उनका बॉयकॉट करें.
21 अप्रेल को आईएसआईएस से जुड़े मुस्लिम चरमपंथियों ने होटलों और गिरिजाघरों पर हमले किए थे जिनमें 250 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.
हमलों के बाद कुछ दिनों बाद मुस्लिम विरोधी हिंसा में कई सौ दुकानों, घरों को नुक़सान पहुंचाया गया.
श्रीलंका सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक़ इन हमलों के पीछे राजनीति थी और हमलावर सिन्हला लोग थे.
पहले आत्मघाती हमले और उसके बाद मुस्लिम विरोधी हिंसा के कारण श्रीलंका में लोग सकते में हैं.
एलटीटीई के साथ दशकों चले गृहयुद्ध के बाद श्रीलंका में पिछले 10 साल शांति के रहे थे.
लोग डर रहे हैं कि क्या एलटीटीई गृहयुद्ध दिनों की बुरी यादें वापस आ गई हैं?
कोलंबो की सड़कों, महंगे होटलों में बंदूक़ लिए सैनिक तैनात हैं. कुछ लोग देश से बाहर जाने तक की बात सोच रहे हैं. लोगों में डर है.
सामाजिक टीकाकार अमान अशरफ़ कहते हैं कि सालों बाद उन्होंने सड़कों पर ऐसे हालात देखे हैं.
वो कहते हैं, "जब हम बड़े हो रहे थे तब हमने सड़कों पर ये हालात देखे थे. आज के बच्चे अपने मां-बाप से पूछ रहे हैं, सड़कों पर सेना का इतना भारी जमावड़ा क्यों है. 15-20 साल पहले ये नज़ारा आम बात थी. जब शांति आई तो सड़कों से बैरियर हटा लिए गए थे."
वो कहते हैं, "हमले के बाद जब मैं मस्जिद में आया तो जगह की हालत देखकर मुझे रोना आ गया. मैंने अल्लाह से कहा, कुछ कीजिए."
जब उन्होंने दंगाइयों को इकट्ठा होते देखा तो वो अपनी मोटरसाइकिल लेकर वहां से भाग गए.
वो कहते हैं, "मैं किसी से लड़ाई नहीं चाहता. मैं श्रीलंका में पैदा हुआ. मेरा मां श्रीलंका की हैं. मैं कहीं बाहर नहीं जाना चाहता. मैं एक मुसलमान ही रहना चाहता हूं. मेरे तीन बच्चे और बीवी हैं और हम शांति चाहते हैं."
मस्जिद पर हमले के बाद मुसलमानों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए जुमे की नमाज़ में दो ईसाई पादरी और एक बौद्ध भिक्षु भी पहुंचे थे.
मस्जिद के चारों ओर हथियारबंद सुरक्षाबल तैनात थे.
दंगाइयों ने मस्जिद के ठीक सामने मिनुअनगोड़ा सेंट्रल मार्केट में भी ख़ासी तबाही मचाई थी और क़रीब आधी दुकानों को जलाकर बर्बाद कर दिया था.
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